क्या सच में राहुल गाँधी ला पायेंगे देश की अच्छे दिन

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कांग्रेस के युवराज छुट्टियों के बाद वापस भारत आ गये हैं. नोटबंदी के बाद कांग्रेस की इस पीढी के नेता बहुत जोर शोर से पीएम मोदी का विरोध करते नज़र आ रहे हैं. संसद के शीतकालीन सत्र में भूकंप लाने की बात करने वाले राहुल गाँधी ने 11 जनवरी को भी कांग्रेस के जनवेदना कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी पर फिर से हमला बोला. राहुल गाँधी के इस भाषण के बाद सोशल साईट ट्विटर पर भी राहुल गाँधी ही ट्रेंड करते नज़र आये.

Rahul Gandhi will really bring the country's best days

अगर राहुल गाँधी के भाषण की बात करें तो राहुल को कुशल वक्ता बनने में अभी बहुत वक़्त लगेगा. अगर आप प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के भाषणों की तुलना क्फ्रें तो पीएम मोदी अपने श्रोताओं की नब्ज पकड़ने में माहिर हैं. और राहुल गाँधी अपनी बात अपने श्रोताओं तक ठीक से पहुंचा नहीं पातें. जैसे कल अपने भाषण के दौरान राहुल गाँधी ने कांग्रेस के  चुनाव  चिन्ह हाथ के पंजे की तुलना ईश्वरीय चित्रों में दिखाए जाने वाले आशीर्वाद से ही कर डाली. कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर राहुल गांधी ने कहा, ”हाथ के निशान का अर्थ होता है डरो मत, हम मानते हैं कि इस देश की जनता को किसी चीज से डरने की जरुरत नहीं है, ये देश जागरुक है. गुरु नानक, गुरू गोविंद सिंह, भगवान शिव सब की फोटो में हमें हाथ दिखता है. इसका मतलब है कि डरो मत.” इसी को लेकर ट्विटर पर लोगों ने राहुल गाँधी का मज़ाक बनाना शुरू कर दिया.

बहुत बार सोशल मीडिया में व बीजेपी के नेताओं ने भी ये कहा  है कि राहुल गाँधी का कांग्रेस में होना बीजेपी के लिए ही फायदेमंद हैं और राहुल भी इस बात को झुठलाने की कोशिश करते नहीं दीखते. मेहसाणा की रैली में राहुल गाँधी ने पीएम मोदी पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगायें उसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही नकार चूका हैं. ऐसे में बिना किसी पुख्ता सबूत के ऐसे आरोपों को देश के प्रधानमंत्री पर लगाना समझदारी तो नहीं कहा जायेगा.

पीएम का विरोध करना समझ आता हैं लेकिन पीएम मोदी ने कुछ अच्छे काम किये हैं उनका भी मजाक उड़ाना प्रंशसा योग्य नहीं कहा जा सकता. जैसे राहुल गाँधी ने  स्वच्छ भारत अभियान, मन की बात, योग और मेक इन इंडिया की आलोचना की. राहुल गाँधी अगर पीएम की हर आलोचना की जगह अपने विचार रखते तो हम उनकी अधिक प्रशंसा करते लेकिन अगर युवा राजनितिक नेता केवल सत्ता पक्ष की आलोचना तक ही खुद को सीमित रखेंगे तो देश की राजनीती में सुधार कैसे होगा?

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